Tuesday, 1 December 2020

"क्यूँ" (KYU)

 


सवेरा है एक नया पर सब धुँवा-धुँवा सा क्यूँ है,
ज़िंदगी तेरा हर खेल अब जुआ-जुआ सा क्यूँ है।।

मंज़िलें एक है इस सफर पर सबकी तो फिर,
हर किसी का रास्ता यहाँ जुदा-जुदा सा क्यूँ है।।

आज मेरे अपने ही मेरे लिखाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है,
उनके दिल मे मेरे लिए जज़्बात ज़रा -ज़रा सा क्यूँ है।।

बड़ी मेहनत से सींचा था मैंने गुलिस्तां ख़्वाबों का,
आज इस गुलिस्तां का हर फूल मरा-मरा सा क्यूँ है।।

आग बुझाने में मेरे घर की कोई आगे नही आया तो फिर,
दिलासा देने वालों का ये हाथ जला-जला सा क्यूँ है।।

सब कहते है कि मेरी कलम बयाँ हक़ीक़त करती है,
आज मेरी कलम का हर लफ्ज़ फिर डरा -डरा सा क्यूँ है।।

ना कोई निशान है उस ज़ख़्म का ना कोई दर्द है अब,
फिर मेरे इस दिल का हरेक घाव हरा-हरा सा क्यूँ है ।।

हर तरह का इश्क़ कागज़ पर उतारा है तूने "चौहान",
फिर क्यूँ इस दिल में कहीं कुछ खला- खला सा क्यूँ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



2 comments:

  1. To nice this line brother ♥️😘आग बुझाने में मेरे घर की कोई आगे नही आया तो फिर,
    दिलासा देने वालों का ये हाथ जला-जला सा क्यूँ है।

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