अब झूठ को सच लिखना क्यूँ है,
जैसे है नही हम वैसा दिखना क्यूँ है,
बड़ी यादें संभाल कर रखी है यूँ तो,
पर उन यादों में हमे जलना क्यूँ है,
तेरे अपने रास्ते है तेरी मंज़िल के,
तन्हा है ठीक है कोई साथ नही,
पर मंज़िलों को हमें बदलना क्यूँ है,
मैं जैसा हूँ क्या वो काफी नही है,
तेरे रंग में हमें ढलना क्यूँ है,
मुहोब्बत है तो फिर यकीन कर,
यकीन नही तो चाहे लाख आज़मा,
कोई अनदेखी तस्वीर ना बना ,
यूँ पानी पर तहरीर ना चला,
जो तेरा है वो तेरा रहेगा ,
बावस्ता किसी को अपना ना बना ,
जो जा रहा है उसको जाने दे "चौहान",
खाली हाथ तेरे है तो भी क्या,
यूँ हर किसी के आगे हाथ ना फैला,
एक अरसे से तलाश में हूँ खुद की,
एक लाश दफ़न है मुझमे लापता,
अब होश-ओं-हवास कहाँ हमें,
खुद में ही मगन, खुद से ही जुदा,
ये किताबों के काले पन्ने रिहाई है मेरी,
यही सबूत इश्क़ के यही गवाह,
एक नाम छुपा कर रख लिया खुद में,
वो मेरा नही तो चल ना सही,
कोई जाकर पूछो हाल उसका,
क्या हो पाया है वो मुझसे जुदा,
एक खुशबू से महक उठता हूँ रोज़ युहीं,
मेरी कब्र पर रह गया शायद दुपट्टा उसी का,
मरकर भी कहाँ खत्म हुआ "चौहान",
किस्सा मेरे एक तरफा इश्क़ का।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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