Thursday, 20 August 2020

"वाकिफ़" (WAQIF)

 


अभी मेरे हाल से ,
वाकिफ़ नही हो तुम,
इन मुस्कानों के जाल से,
नज़र के सवाल से ,
वाकिफ़ नही हो तुम..

जो दिख गया वो बिक गया,
जो छिप वो रह गया,
चिंगारी खुशियों की बुझ गयी,
जली ग़मो की मिशाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम...

कोई सुनता तो कह सुनाता,
पास बैठाता सीने से लगाता,
इस महफ़िल की तन्हाई से,
उस रुसवाई के मलाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम..

लिखना बहुत कुछ बाकी है,
अभी इतना ही काफी है,
"चौहान" दर्द के अल्फ़ाज़ से,
खामोशी की आवाज़ से,
इस कलम में कमाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम..

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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