Saturday, 6 June 2020

"ज़िंदगी" ( ZINDAGI)


कुछ सवाल कुछ जवाब,
कुछ हक़ीक़त कुछ ख़्वाब,
समझते समझते निकल गयी,
ये जिंदगी सहाब!!

पेट की भूख, कुछ जरूरतें,
रोटी,कपड़ा और मकान,
कमाते-कमाते निकल गयी,
ये जिंदगी साहाब!!

कहीं काटे कही फूल कही पत्थर,
एक ख़्वाब, एक मंज़िल, ये रहगुजर,
पास आते-आते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कुछ अपने, कुछ पराये,
कुछ नामी तो कुछ बेनाम,
निभाते-निभाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कहीं उम्र का तज़ुर्बा, कही सोच की कमी,
कही बदतमीजियां कही लियाक़त,
यही सुनते-सुनाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कही मेहनत, कही तक़दीर,
कभी राज़ा तो कभी फ़क़ीर,
किन-किन हालातों से निकल गयी,
ये जिंदगी साहाब!!

कहीं मजबूरी, कही ज़िम्मेदारी,
कही कामियाबी कही नाकारी,
बस तोहमतों में ही निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

ना मैं कभी समझा पाया,
कभी तुम समझ पाए,
बस शिकायतों में निकल गयी
ये ज़िंदगी साहाब!!

लिखे क़लम से सब एक कागज़ पर,
"चौहान" ने तेरे सवालों के जवाब,
यूँ लिखते-लिखाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

4 comments:

  1. कुछ सवाल कुछ जवाब,
    कुछ हक़ीक़त कुछ ख़्वाब,
    समझते समझते निकल गयी,
    ये जिंदगी सहाब true 😋😋😍😍😍😍

    ReplyDelete
  2. कहीं उम्र का तज़ुर्बा, कही सोच की कमी,
    कही बदतमीजियां कही लियाक़त,😍😍
    ...लियाक़त kya hoti hai

    ReplyDelete

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