Tuesday, 9 June 2020

"एक रोज़" (EK ROZ)


मैं हालात लफ़्ज़ों में पिरो दूँगा,
तुम पढ़ के रो जाओगे,
हम तुम्हारे नही हुए तो कोई बात नही,
तुम तो किसी के हो ही जाओगे,
तेरी और मेरी रात में बस फर्क इतना है,
हम सोए रहेंगे ख़ामोश कब्र में,
तुम किसी और कि बाहों में सो जाओगे।।
हम मुरझा जायेंगे किसी टूटे फूल की तरह,
तुम अबके सावन में फिर खिल खिला जाओगे,
कोई तुम्हे क्यूँ ना पसँद करे आखिर,
ताज़महल सी हो तुम,रात में और चमक जाओगे,
मैं कोई चंदन का पेड़ तो नही हूँ,
के तुम आओगे और मुझे लिपट जाओगे,
मैं इत्र सा पर अब वो खुशबू नही है,
ज़ाहिर है कहाँ मुझसे अब तुम बदन महकाओगे,
लड़ोगे, झगड़ोगे, मुझसे हर रोज़ तुम,
फिर कोई बेतुका बहाना लेकर छोड़ जाओगे,
कोई मेरी कब्र पर फूल सजायेगा उस दिन,
और तुम बेख़बर फूलों की सेज पर सो जाओगे।।
कभी ज़िक्र आया किसी कहानी में तो याद कर लोगे,
लोग नज़्म अनदेखा करते है "चौहान" की ,
तुम मेरी कब्र के सामने से गुज़र,मुझे अनदेखा कर जाओगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. लड़ोगे, झगड़ोगे, मुझसे हर रोज़ तुम,
    फिर कोई बेतुका बहाना लेकर छोड़ जाओगे,
    Bhut badhiya bhai,,, osssssssssm

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