Thursday, 19 December 2019

"रात-ब-रात" (RAAT-B-RAAT)


अब तो रात-ब-रात मुश्किल हो रही है,
नींद आँखों से औझल हो रही है,
अभी कशमकश हो गयी है जिंदगी,
ना क़रीब आ रही है ना दूर हो रही है...
अब तो रात-ब-रात......

एक सैलाब सा उठता है इस दिल मे,
एक दरिया खामोश है इन आँखो में,
ना जाने कैसी रूह से जिस्म की अनबन हो रही है,
एक लौ है जो जल रही है और बुझ रही है...
अब तो रात-ब-रात......

यूँ तो पूरा गुलिस्तां सजा है फूलों से,
बस एक फूल की ही कमी है,
अब होश में ना आऊँ तो ही बेहतर है,
इस ज़िंदगी से तो सच मौत भली है,
अब तो हँसी भी मेरी छुप-छुप कर रो रही है,
अब तो रात-ब-रात......


कुछ समझ आये तो जज़्बात जमाने को बताऊँ,
कुछ नज़र आये तो राह में चलता चला जाऊँ,
अब बस ज़ुबाँ खामोश हो रही है,
धीरे धीरे "चौहान" ये रूह मिट्टी मिट्टी हो रही है,
अब तो रात-ब-रात......


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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