Wednesday, 25 December 2019

"मुहोब्बत लिखना" ( MUHOBBAT LIKHNA)


अब मैं मुहोब्बत लिखना छोड़ दूँगा,
अब इन बाज़ारो में बिकना छोड़ दूँगा।।

तुझे ही मुबारक हो तेरी ये राहे ये मंज़िले,
अब मैं साये सा तुझे दिखना छोड़ दूँगा।।

अगर पूछा कभी किसी ने मेरी ख़ामोशी का राज़,
कसम खुदा की मैं नाम तुम्हारा लिखना छोड़ दूँगा।।

मैंने कब कहा कि ये सफर यही तक था,
तुमने खुद ही सोच लिया मैं रिश्ता तोड़ दूँगा।।

तुम कहाँ तक सच्चे थे अपने इश्क़-ए-ईमान के,
आमने सामने सवाल कर तेरा गुमाँ भी तोड़ दूँगा।।

बेमतलबी इबादत थी मेरी इसका भी मतलब था,
खुदा ना मिला तो क्या मैं इबादत ही छोड़ दूँगा।।

ये इश्क़-मुश्क, प्यार वफ़ा , सब कुछ तो झूठ फरेब है,
जिस्मों को पाना इश्क़ है तो दिल लगाना ही छोड़ दूँगा।।

हर एक अपने तो खंज़र घोपा है पीठ पर मेेरे,
"चौहान" अब सबसे अपना पेश आना ही छोड़ दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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