Wednesday, 11 December 2019

"माफ कर" (MAAF KAR)


कब तक खुद को जलाऊँगा मैं,
अंधेरो में रौशनी दिखाऊंगा मैं,
ये फलक ,ज़मी मेरा कुछ नही,
तुझे किस जगह ठहराऊंगा मैं,
अब टूटा बिखरा साज़ हूँ मैं,
खामोश सी आवाज़ हूँ मैं,
पहुँचे खुदा तक बादलों को चीर के,
ऐसी सदा कहाँ से लाऊँगा मैं,
क्यों सबका एक सवाल है,
जिसका तू जवाब है,
तुझे गलत मैं कह नही सकता,
जमाने को सच क्या बताऊंगा मैं,
सूखे हुए दरख़्त सा मैं,
अब किसके काम आऊँगा मैं,
तेरी छुवन से हरा हो जाता,
अब तो बस जलाया ही जाऊँगा मैं,
रोक लेने दे जज़्बात अपने,
कहीं लिख ना दूँ हालात अपने,
हर किस्से में तो ज़िक्र तेरा है मगर,
कब तक "मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ" बनाऊँगा मैं,
बात तुझ तक कभी आने नही दूँगा,
तेरे चेहरे पर उदासी छाने नही दूँगा,
अब लिखना लिखाना बहुत हुआ,
सब राज़ अपने साथ दफन कर जाऊँगा मैं,
चल अब तो इंसाफ कर,
सब गिले-शिकवे माफ कर,
अब हाल-ए-दिल लिखा नही जाता,
बस,अब "चौहान" को माफ कर।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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