कई दफा मंज़िलों को छोड़,
रास्तों का हो जाना बेहतर है।।
जरूरी नहीहर सवालों का जवाब दे,
खामोशी को जवाब बनाना बेहतर है।।
मैं इस मोड़ पर आ गया हूँ इश्क़ में,
अब तो खुद को मिटाना ही बेहतर है।।
कहाँ शायरों की ज़ुबाँ समझ आएंगी ,
अब कलम ना ही उठाना बेहतर है।।
रोज़ खुद की तलाश में निकल पड़ता हूँ,
अपनो से अपना पेश ना आना बेहतर है।।
इंसानियत तो पहले ही दम तोड़ चुकी है,
पत्थरों पर सिर झुकना ही बेहतर है।।
अब सबसे किनारा कर लिया "चौहान",
खुद को हमराज़ खुद का बनाना बेहतर है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Nice....
ReplyDeleteNice....👌👌👌
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteNice lines ��
ReplyDeleteThanks 😍😍😍
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