झूठो की दुनिया थी,
मैं सच का तरफ़दार बनके आया था,
बारिशों का मौसम था ,
मैं एक जलती अँगार बनके आया था,
कहाँ खबर थी के मेरे आना ठीक नही,
पतझड़ के मौसम में बर्गो-बहार बनके आया था,
हश्र देख कतरा रहे थे लोग इश्क़ करने को,
हक़ीक़त है मैं इश्क़ का खुमार बनके आया था,
रात रात भर जाग कर लिखा है हाल जमाने का,
लोग समझते है मैं उनका तरफ़दार बनके आया था,
हर किसी ने अपना राज़ खोल दिया आगे मेरे,
जैसे तो उनका राज़दार बनके आया था,
किताबों के आख़िरी पन्नों पर लिखी बाते,
अब तलक याद है,
ये भी राज़ है के मैं एक कलमकार बनके आया था,
बर्बाद तो होना ही था "चौहान"
नासमझ था , पत्थरों की बस्ती में ,
शीशे के व्यापार करने आया था।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Bhai r
ReplyDeleteThanks bro 😍😍😍
DeleteWah mast....��������
ReplyDeleteThanks 😍😍
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