दौर गुज़रा बचपन का जवानी आ गयी,
याद पुरानी एक वो कहानी आ गयी।।
एक गीत सुना बचपन मे "ख़न्ट वाले मान" का,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा , शायर "बब्बू मान"का।।
एक रंग नया हर गीत में नज़र सा आता था,
सुनकर एक दफा बस वो ज़ुबाँ पर चढ़ जाता था।।
"सौण दी झड़ी" से "प्यास" से फिर "मेरा गम",
"ओही चन्न ओही रातां" बस दिल कुर्बान था।।
एक गीत है जो दिल बार बार सुनना ही चाहता है
"दिल तां पागल है" आज भी आँखे नम कर जाता है।।
हश्र का क्या ज़िक्र करूँ वो इश्क़ का पैगाम था,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा शायर "बब्बू मान"का।।
तुझको सुन सुनकर मैंने भी कलम उठाई थी,
लिख कर अपनी पहली नज़्म आँखे ही भर आईं थी।।
माना आज बहुत दूरी है पर उम्मीद अभी बाकी है,
लिखे बहुत किस्से मैंने पर एक फ़साना बाकी है।।
करूँगा ज़िक्र मुलाकात का उस हसीन लम्हात का,
शायर "बब्बू मान" से अभी मिलना "चौहान" का बाकी है।।
एक नज़र बस आपके ख़ातिर पैगाम ये "चौहान" का,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा शायर "बब्बू मान"का।।
बस दिल का ही नही वो जो सच्चा है ज़ुबाँ का,
मैं भी हूँ मुरीद बड़ा शायर "बब्बू मान"का।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Jai ho Shubham
ReplyDeleteThanks bro 😍😍🤗🤗
DeleteAwesome 😍😍😍😍
ReplyDeleteThanks bro😍😍😍🤗🤗
ReplyDeleteAtt Saab
ReplyDeleteThanks 😍😍
Delete