मैं जलता चिराग था, हवाओं से सहारा माँग रहा था,
मैं एक आफ़ताब था, रातों से सहारा माँग रहा था।।
डूब जाता तो भी कोई बात नही थी इस सागर में,
मैं टूटी कश्ती था तूफानों से सहारा माँग रहा था।।
एक चिंगारी थी मेरे दिल मे जो आग बनानी थी मुझे,
इन लपटों के लिए मैं बारिशों से सहारा माँग रहा था।।
दिल की ज़मी एक अरसे से बंजर पड़ी थी मेरी ,
फ़िज़ाओं से नही खिज़ाओं से सहारा माँग रहा था।।
कलम सुख गयी थी पर कागज़ खाली थे ज़िन्दगी के मेरे,
अब स्याही से नही "चौहान" लहूं से सहारा माँग रहा था।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Nice yrr
ReplyDeleteThanks 😍😍
Deleteएक चिंगारी थी मेरे दिल मे जो आग बनानी थी मुझे,
ReplyDeleteइन लपटों के लिए मैं बारिशों से सहारा माँग रहा था।।
Awesome brother 😘😘😘😘