Saturday, 5 October 2019

"क्या हो गया" (KYA HO GYA)


समझ नही आता , आजकल मैं क्या हो गया हूँ,
पत्थर हो गया हूँ या पिंघल कर मोम हो गया हूँ।।

अक्सर तन्हा रात में अनजानी सी याद लेकर,
एक कोने में बैठकर पहरों पहर मैं रो गया हूँ।।

कोई गम कोई गिला शिकवा कुछ भी तो नही,
फिर क्यूँ ये हँसी छोड़ उदासियों का हो गया हूँ।।

मेरा हाल क्या है मेरी कलम भी ना कह पाती है,
सबकी कहानी लिखी अपनी में खामोश हो गया हूँ।।

क्या कशमकश है अब तुम्हे क्या समझाऊँ मैं,
ख्वाबों को ज़िंदा रखते रखते मैं दफन हो गया हूँ।।

ना डूब रहा हूँ ना किनारे नसीब हो रहे है यहाँ,
हाँ ,समुंदर में तैरती हुई बेड़ियों सा हो गया हूँ।।

कलम भी है "चौहान" लफ्ज़ भी और जज़्बात भी,
जिसपे लिखा ना जा सके वो गिला कागज़ हो गया हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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