Sunday, 8 July 2018

"क्या लिखूँ" (KYA LIKHUN)


आज कुछ लिखने को नही था,
फिर भी कलम उठा कर सोचता रहा,
सोचता रहा रात भर के क्या लिखूँ??
फिर कहीं दूर दिल मे झांक के देखा,
तो मुझे सिर्फ तेरा ही ख्याल आया,
सोचा आज कुछ लिखूँ तेरे बारे में ,
पर ना जाने क्यों कलम थम गई मेरी,
और सोचता रहा युहीं रात भर,
तेरी बेपरवाही लिखूं या बेवफाई लिखूँ,
बस इसी मज़लिश में रात भर जागता रहा,
और सोचता रहा के क्या लिखूँ??
आंखें बंद करके जब भी देखा,
बस एक तेरी सूरत नज़र आयी,
जब लिखना चॉहा की क्यों तेरा अब तक इंतजार है,
फिर सोचने लगा क्यों मुझे अब तलक तुझसे प्यार है,
क्यों ना जान सके तुम वफ़ा-ए-मुहोबत,
कैसे मुहोबत अपनी किसी और के नाम लिखूँ,
कैसे अपने हाथों अपनी मुहोबत पर इल्ज़ाम लिखूं,
निकल ही नही पाया तेरे ख्यालों से कभी "चौहान",
गुज़ार दी ना जाने कितनी रातें युहीं तन्हा,
और सोचता रहा के क्या लिखूँ??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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