खुशियों की बारात आ गयी है।।
मौसम तो नही था आज ये बारिश का,
फिर क्यूँ आँखों मे बरसात आ गयी है।।
ये कैसी खुशी के ज़ाहिर नही कर सकते,
सच पूछो तो जश्न की रात आ गयी है।।
तुझे अपना तो नही कह सकता मैं अब,
फिर क्यूँ आज अपनेपन की बात आ गयी है।।
अभी तुझे भूलने की कोशिश भी नही की थी,
"चौहान" को तू आज फिर याद आ गयी है।।
सोचा था कभी मनाऊंगा जश्न तेरे साथ इस रात का,
कहाँ ख़बर थी खामोशियाँ भी साथ आ गयी है।।
एक वही नही है महफ़िल में जिसे तू चाहता है,
कहने को यूं तो दरवाजे पर बारात आ गयी है।।
वैसे अनोखा रहेगा "चौहान" इस बार का ये जश्न-ए-आलम,
इश्क़-मुहोब्बत, हँसी-खुशी सबको मौत एक साथ आ गयी है।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wah wah
ReplyDeleteThanks bro 😍😍
DeleteNice lines bhai ❤️
ReplyDeleteThanks 😍😍
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