Friday, 5 March 2021

"क़लमकार" (KALAMKAAR)


आज फिर मैं खुद से ही लड़-झगड़ कर आया हूँ,

आज फिर मैं एक सोच का कत्ल करकर आया हूँ।।


ये जैसी बताते थे हमको ये दुनिया वैसी तो नही है,

आज फिर मैं वक़्त की ठोकर से संभलकर आया हूँ।।


कहाँ है वो जो कहते थे तेरे हर वक़्त में साथ है,

आ जाओ मैं अपने अतीत से लड़कर आया हूँ।।


मेरी हक़ीक़त से कहाँ मुहोब्बत हो जाएगी तुम्हे,

आ जाओ आज तो मैं बन सवँर कर आया हूँ।।


पूछते है सब हमसे की हम इश्क़ क्यूँ नही करते,

कैसे कहूँ अभी पुरानी चोट से उभर कर आया हूँ।।


कहाँ है वो लोग जो कहते थे इंसानियत बिकाती नही है,

देखो मैं पैसों से लोगो के ज़मीर खरीदकर आया हूँ।।


ये कलम ही हथियार है शायरों के शहर में साहब,

नाजाने कितनी कहानियों में मैं मरकर आया हूँ।।


वो जिसको हमेशा गिला रहा के मैंने उसे कभी लिखा नही,

आज काट कर कलाई लहू से अपने लिखकर आया हूँ।।


हक़ीक़त नही वो लिख "चौहान" जो जमाने को भाये,

आज बड़े बड़े कलमकारों से मैं ये सीखकर आया हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

 

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