तू किस खुदा ,किस पीर ,किस भगवान, को मनाना चाहता है,
ऐसा क्या है किसी की जान से कीमती जो तू पाना चाहता है।।
गर चढ़ाना है तो शीश अपना या तेरे अपनो का चढा,
फिर देख कैसे तुझे नही मिलता जो तू पाना चाहता है।।
बेज़ुबानों के लहू से क्यों धरती ये आँगन सींच रहा है,
उस जिस्म में भी जान है जिसकी आँखे तू सदा के लिए मीच रहा है।।
वो आवाज़ें दिल की सुन लेता है तेरी श्रद्धा को भांपता है,
कब उसने कहा कि बलि देने से मुँह माँगा फल मिल जाता है।।
अपनी खुशियों की ख़ातिर किसी की हस्ती ना मिटा,
वो चहरे से तेरी नियत तेरे कर्म सब पहचान जाता है।।
खुद को आज के युग का बता ना जाने किन रीति रिवाज़ों को मानते है,
वो किसी के कत्ल से नही , एक नारियल या एक चादर से ही मान जाता है।।
इंसानियत मार कर "चौहान" लोग कैसा अजीब रिवाज़ निभाने चले है,
लाश बनाकर जीव को देखो, पत्थर ,पत्थर को मनाने चले है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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DeleteSuperrrrrrrrr bro
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