Tuesday, 23 July 2019

"हार गया" (HAAR GYA)


मैं हक़ीक़त से नही सपनो से हार गया,
मैं गैरो से नही मेरे अपनो से हार गया।।

ये लहरें, तूफ़ान, किनारे तक ले आये मगर,
किनारे पर आकर मैं तिनके से हार गया।।

आज खिलाफत में है जो कल मेरे बनते थे,
जीत जाता पर किसी के इशारे पे हार गया।।

बड़ी उम्मीद थी मुझको कल मंज़िलों से मेरी,
मंज़िलों पर आकर मैं मंज़िलों से हार गया।।

सारा सागर ,दरिया पर कर लिया तूफानों में मगर,
वक़्त की हेर-फेर थी एक कतरे से हार गया।।

सच बोल भी देता मैं तुम्हे पर क्या फ़ायदा था,
भरोसा किया था मैंने जो उसी भरोसे से हार गया।।

लिखने को तो आज भी बहुत कुछ था "चौहान",
मैं लफ्ज़ो से नही अपनी कलम से हार गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. Kiska hai ye tumko intazar, mai hu naaa.....
    Dekhlo idhar to ek baar ,mai hu naaa....

    ReplyDelete

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...