Sunday, 21 July 2019

"बेज़ुबाँ कलम " (BEZUBAA'N KALAM)


बेजुबाँ कलम मेरी ,क्या लिखुँ क्या ना लिखूँ,
हक़ीक़त तुम्हे रास ना आएगी फसाना मुझे,
ये जो घुट घुट के दाम तोड़ रही है आवाज़ मेरी,
क्या इस खामोशी को बयां करते कोई अल्फ़ाज़ लिखुँ।।
मुहोब्बत लिख तो देता पर आजकल करता कौन है,
हालात सौ दफ़ा लिखे पर यहाँ पढ़ता कौन है,
किसे फिक्र है यहाँ किसी के हाल की "चौहान",
दूसरों की ज़ख़्मो की मलहम पट्टी करता कौन है,
सोच लिखुँ, ख़्यालात लिखुँ ,या दिल की बात लिखुँ,
काश कोई अपना मिले जिसके लिए दिन रात लिखुँ।।
आँखो का सागर तो अब सहारा हो गया सुख के,
वो जो लबों पर आकर ठहर गया था एक बूँद पानी लिखूँ।।
अपनी लिखुँ या बेगानी लिखुँ , सोच रहा हूँ कोई एक कहानी लिखुँ,
बिक जाऊँ फिर दुसरो की कही बात लिखूँ,
या टिका रहूं अपने ज़मीर पर जो दिल करता है वो बात लिखूँ,
बेजुबाँ कलम मेरी, क्या लिखूँ क्या ना लिखुँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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