रोते है पर आँसू कभी आँखो में ना लाते है,
हाँ , आजकल बेटे भी घर छोड़ जाते है।।
ना जाने कितनी तकलीफें सहते है अकेले,
माँ बाप को अपनी परेशानी नही बताते है।।
जो मिलता है चुपचाप बना कर खा लेते है ,
हाँ अब वो खाने में नखरे नही दिखाते है।।
याद आती है तो अकेले में रो भी लेते है,
फिर दोस्तों संग मिलकर मन बहलाते है।।
भूखे भी सो जाते है ना जाने कितनी ही बार,
अक्सर माँ के हाथ को रोटी को तरस जाते है।।
मेहमानों की तरह हो गए अपने ही घर मे वो,
सालों मे आते है दो दिन ठहर कर चले जाते है।।
जमाने की नज़र में बड़े सुकून से जीते है,
सच पूछो तो घर के आँगन बहुत याद आते है।।
कैसी भूख है पेट की "चौहान" रिश्तों के मायने नही,
माँ बाप बेटे एक दूसरे को देखने को तरस जाते है।।
घर पराये तो नही बेटियों की तरह मगर "चौहान",
वक़्त का खेल है अपने घर आने को तरस जाते है।।
अक्सर खुद से मैं ये सवाल करता हूँ "चौहान",
पैसा सबकुछ नही तो क्यों बेटे घर छोड़ जाते है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Ladke bhi ghr chhod kr jaate hai....
ReplyDeleteHmmmmm😊😊😊😊
DeleteIt's true shubham ji...aap bht acha likhe hai...
ReplyDeleteShubham ji 🙄🙄🙄🙄 ...pi li ke subha subha .....🤣🤣🤣🤣🤣 Anyways thanks biresh ji 🤣🤣🤣🤣
DeleteTrue lines bro , 🌹🌹
ReplyDeleteThanks yashpal bro 😍😍😍😍
DeleteKya baat hai .... Apki likhne ka inspiration kaha se mila ??
ReplyDeleteJi aapse aur biresh sharma ji se 🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣
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